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Showing posts from September, 2017

Theatre Thinker Manjul Bhardwaj Sculpting University of Life through Theatre - Dhananjay Kumar

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Manjul equips play writers with an avante garde genre. He pulls them closer to the incidental happenings in the society and brings them face to face with the experiences, environment and background of the sufferer; thereon he liberates the writer…
Manjul Bhardwaj’s Theatre of Relevance philosophy breaks through the dimensions of the stage and re-establishes theatre in the accessibility of common man and its implementation in day to day life. His plays are beyond the realm of entertainment, it intrigues, questions, pivots you to your thought processes and invoke you to set your own parameters of rationalising and reassessing your environment, the society. This is Manjul Bhardwaj’s own cultivation.
To celebrate the 25 years of Theatre of Relevance philosophy, 3 days theatre festival and Theatre summit was organised on 10, 11 and 12 august 2017 in New Delhi.

Manjul Bhardwaj commenced his theatrical journey as a usual theatre practitioner. Those days witnessed his passion for theatre and…

थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस का दिल्ली नाट्योत्सव

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थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के दिल्ली नाट्योत्सव ने दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी !
थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस नाट्य दर्शन के सृजन और प्रयोग के 25 वर्ष पूरे हुए. अपने सृजन के समय से ही देश और विदेश, जहां भी इस नाट्य दर्शन की प्रस्तुति हुई, न सिर्फ दर्शकों के बीच अपनी उपादेयता साबित की, बल्कि रंगकर्मियों के बीच भी अपनी विलक्षणता स्थापित की. इन वर्षों में इस नाट्य दर्शन ने न सिर्फ नाट्य कला की प्रासंगिकता को रंगकर्मी की तरह पुनः रेखांकित किया, बल्कि एक्टिविस्ट की तरह जनसरोकारों को भी बार बार संबोधित किया. दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी. इन 25 वर्षों में थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के सृजनकार मंजुल भारद्वाज ने भारत से लेकर यूरोप तक में अपने नाट्य दर्शन के बिरवे बोये, जो अब वृक्ष बनने की प्रक्रिया में हैं. इन 25 वर्षो के सफ़र के माध्यम से मंजुल ने यह भी साबित किया कि बिना किसी सरकारी अनुदान और कॉरपोरेट प्रायोजित आर्थिक सहयोग के बिना भी सिर्फ जन सहयोग से रंगकर्म किया जा सकता है और बिना किसी हस्तक्षेप के पूरी उनमुक्तता के साथ किया जा सकता है. ऐसे में 25 वर्ष पूरे ह…