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Showing posts from July, 2017

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य दर्शन के 25 वर्ष : “दिल्ली” में 10,11 और 12 अगस्त 2017 को 3 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस – नाट्य उत्सव’

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थिएटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन के 25 वर्ष 10,11,12 अगस्त, 2017 को "दिल्ली में 3 दिवसीय नाट्य उत्सव” काल को चिंतन से गढ़ा और रचा जाता है.चिंतन आपके भीतर से सृजित होकर वैश्विक क्षितिज को पार कर विश्व में जीता है.कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. कलात्मक चिन्तन ही मनुष्य के विष को पीने की क्षमता रखता है.1990 के बाद का समय दुनिया के लिए ‘अर्थहीन’ होने का दौर है.ये एकाधिकार और वर्चस्ववाद का दौर है.विज्ञान के सिद्धांतों का तकनीक तक सीमित होने का दौर है. आज खरीदने और बेचने का दौर है. मीडिया का जनता की बजाए सत्ता की वफ़ादारी का दौर है.ऐसे समय में ‘जनता’ को अपने मुद्दों के लिए ‘चिंतन’ और सरोकारों के एक मंच की जरूरत है. ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्धांत 12 अगस्त,1992 से जनता के सरोकारों का ‘चिंतन मंच’ बनकर कर उभरा है और आज अपने ‘रंग दर्शन’ के होने के 25 वर्ष पूर्ण कर रहा हैं. इन 25 वर्षों में ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने गली, चौराहों, गावों, आदिवासियों, कस्बों और महानगरों से होते हुए अपनी वैश्विक उड़ान भरी है और वैश्विक स्वीकार्यता हासिल की है. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के सिद्धांत 1. ऐसा रंगकर्म जिसकी सृजनश…

25 years of “Theatre of Relevance” :3-days Theatre festival in Delhi

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“Theatre of Relevance”-25 years of theatrical philosophy 10, 11, 12 August 2017 "3-days theatre festival in Delhi"

Epoch is created and wrought through contemplation. Contemplation, being generated from within you and crossing global horizons, survives in the world.  Art make humans human. Artistic process & reflection alone possesses the capacity of soaking human poison. The period after 1990 has been an era of “Irrelevance” for the world. This has been a period of monopoly and dictatorship. A period of limiting the principles of science to technology alone. Today is the period of buying and selling. A period where media instead of being faithful to the people, is faithful to thy masters & rulers. In these threatening times, the “people” needs ‘contemplation’ for their issues and a platform for their concerns. ‘Theatre of Relevance” theatrical philosophy’ has evolved as a ‘contemplation platform’ for public concerns since 12th August, 1992 and it is completing 25 years…

"Theatre of Relevance"-The artistic roar of humanity! - Manjul Bhardwaj

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25 years of  philosophy“Theatre of Relevance”- (1992 -2017)
"Theatre of Relevance"-The artistic roar of humanity!







थिएटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन के 25 वर्ष :दिल्ली में 3 दिवसीय नाट्य उत्सव

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'थिएटर ऑफ़ रेलेवंस' नाट्य सिद्धांत की रंग यात्रा के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 10,11 और 12 अगस्त 2017 को दिल्ली में तीन दिवसीय नाट्य उत्सव और रंगविमर्श का आयोजन किया जा रहा है। 


सत्ता हमेशा कलाकार से डरती है
मुझे याद है वो दिन जब अपने रंगकर्मियों को सफ़ेद कुर्ता देते हुए कहा था ‘ये है अपना कफ़न’! सभी कलाकारों ने दंगों की नफरत व घावों को अपनी कला से प्यार और मानवीय ऊष्मा से भर दिया.... मंजुल भारद्वाज, रंगकर्मी नब्बे का दशक देश, दुनिया और मानवता के लिए आमूल बदलाव का दौर रहा। 'औद्योगिक क्रांति' के पहिये पर सवार होकर मानवता ने सामन्तवाद की दासता से निकलने का ख्वाब देखा, पर नब्बे के दशक तक आते आते साम्यवाद के किले ढह गए और 'औद्योगिक क्रांति' सर्वहारा की मुक्ति का मसीहा होने की बजाए पूंजीवाद का खतरनाक, घोर शोषणवादी और अमानवीय उपक्रम निकला, जिसने सामंती सोच को न केवल मजबूती दी बल्कि विज्ञान के आविष्कार को तकनीक देकर भूमंडलीकरण के जरिये दुनिया को एक शोषित ‘गाँव’ में बदल दिया. ऐसे समय में भारत भी इन वैश्विक प्रक्रियाओं से अछूता नहीं था. एकध्रुवीय वैश्विक घटनाओं ने भ…

Theatre Thinker Manjul Bhardwaj facilitates youth to explore their political Identity in "#TheatreofRelevance -#राजनैतिकआत्मबोध " #स्वराजशाला

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Facilitated 4 day "#TheatreofRelevance -#राजनैतिकआत्मबोध " #स्वराजशालाorganised by #Youth4Swaraj at #Smabhavana Institute in Palampur , Himachal Pradesh from 25-28 June ,2017 in which Youth from Delhi, Haryana, Himachal & Punjab explored their political self .... Lovey Vikram share her Journey of 'Swaraj Shala".. Must read story ....


Ye Swarajshala kiski hai?…….Hamari _______my experiences of Swarajshala, Palampur Swarajshala, an initiative by Youth 4 Swaraj(Y4S), gave me an avenue of working in a very different kind of group and of understanding a different group dynamics. Group or collective has been an area of interest for me owing to my research work. However, bringing theory to practice was very different. Swarajshala was a unique group as compared to the various groups that I had worked with or worked in. I have witnessed my apprehension and indifference towards political and social issues transform into a sense of belongingness and affirmation. Instead of be…